सिंधुताई "माई "

सिंधुताई "माई "


जीवन में आपने बहुत सी कहानियाँ सुनी होगी पर कभी ऐसी कहानी शायद ही सुनी होगी की एक ऐसी औरत जिसने जलती हुई चिता पर रोटी पकाकर खाया होगा और बहुत से अनाथ बच्चो का सहारा बनी उनकी जीवन को बदल दिया।  उस महान औरत का नाम सिंधुताई सपकाल है जिसे लोग सिंधु ताई के नाम से जानते है और बहुत से लोग माई बुलाते है। बहुत से लोगो का यह मन है की जब आपके सामने यह आती है तो आप ना चाहते हुए भी आप इनके पैर छूने के लिए झुक जायेंगे वह इसलिए नहीं की वह बड़ी है बल्कि एक इनके लिए आदर भाव करने के लिए उनके सामान के लिए कोई भी झुक जायेगा। 

आखिर कौन हैं सिंधुताई ?

यह एक मराठी समाज कार्यकर्त्ता है।  इनका जन्म 14 नवंबर 1948 में वर्धा महाराष्ट्र में हुआ था। इनके पिता एक चरवाह थे माता ग्रहणी थी इनकी माता इनको नहीं पसंद करती थी क्योकि वह एक लड़की थी इसलिए इनकी माता इनको पसंद नहीं करती थी। पिता इनको बहुत पसंद करते थे इसलिए इनको स्कूल भेजा पर पैसे की कमी के कारण इनको स्कूल से निकल कर शादी करवा दिया।  छोटी सी उम्र में इनका बाल विवाह करवा दिया सिंधुताई की उम्र जब 12 साल की थी तो अपने से बड़े उम्र के लड़के के  साथ शादी करवा दिया गया। इनके पति एक चरवाह थे। 


जब सिंधुताई 20 साल की थी तब उनके तीन बच्चे थे। इनके पति चरवाह थे और यह गोबर उठाती थी गांव वालो को मजदूरी ना मिलने से सिंधुताई ने आवाज उठाई और इनको सफलता भी मिली पर कुछ लोगो को यह पसंद नहीं आया तो सिंधुताई के पति को सिंधुताई के बारे में गलत बाते बता कर उनके खिलाफ कर दिया फिर एक दिन जब सिंधुताई के पेट में उनकी 9 महीने की बेटी थी तब उनके पति ने बहुत बुरी तरह मारा और गाये के तबेले में फेक दिया उसके बाद सिंधुताई बेहोश हो गई और कब उनका बच्चा हो गया उनको भी नहीं पता चला। 
उसके बाद एक गाय ने चिल्ला कर उनको उठाया जब वह उठी तो देखा एक बच्ची रो रही थी उसके बाद उनको नाल काटनी थी उनके पास कुछ नहीं था तो इन्होने पत्थर को 16 बार मार कर अलग करा एक माँ के लिए यह बहुत दर्द भरा पल होता है यह सब होने के बाद वह अपनी माँ के पास गई पर वहाँ भी जगह नहीं मिली माँ  ने भगा दिया। 
इन्होने मरने की सोची बच्ची को लेकर ट्रैन की पटरी पर बैठ गई मगर जब बच्ची की सकल देखी तब लगा इनको जीना है उसके बाद वह भीख मांग कर खाती थी औरो को भी खिलाती थी तभी उन्होंने अनाथ बच्चो को देखा और उनको भी अपने साथ रखने लग गई। 

शमशान में रोटी पकाकर खाई ?

सिंधुताई ने इंटरव्यू में बतया की कैसे उन्होंने शमशान में रोटी पकाकर खाई वह बताती है की वह शमशान में रहती थी।  वह जानती थी की रात में कोई नहीं आता तो रात में जलती हुई चिता पर रोटी पकाकर खाती थी वह बताती है जब उन्होंने पहेली बार ऐसा करा तो उन्हें बहुत डर लगा पर क्या करे भूख सब करवाती है उनको अपनी बच्ची और बच्चो को पालना था तो कुछ भी कर सकती थी 

सिंधुताई ने कई अनाथ बच्चो को अभी तक अपने आश्रम में रखा है और सहारा दिया है  लगभग 1200 बच्चो को अभी तक सहारा दे चुकी है आज सभी इनको माई बोलते है और इनके 250 दमाद और 50 बहू हैं और 750 पुरस्कार मिल चूका है इनके सभी बच्चे आज अच्छे मुकाम पर है कोई डॉक्टर है कोई वकील है तो कोई बिज़नेस कर रहा है इनकी खुद की बेटी वकील है। 


सिंधु ताई ने आपने जीवन में संघर्ष और सफलता की वजह अपनी माँ को बतया है सिंधुताई बताती है की अगर उस दिन मेरी माँ ने मुझे घर में आने दिया होता तो शायद आज इतना बच्चो की माई नहीं बन पाती।  80 साल की उम्र में उन्होंने अपने पति को अपनया है पति के रूप में नहीं बल्कि एक बेटे के रूप में वह बोलती है की वह रिश्ता तो कब का ख़तम हो गया है अब मैं सबके लिए एक माई हूँ वही रहूंगी। 

आज के समय में लोग एक छोटी सी मुश्किल आ जाती है उसे भागते है पर इन्होने जो समाज के लिए करा है शायद ही कर पाए जब तक मुश्किलों का सामना नहीं करोगे तब तक खुद के बारे में नहीं जान सकते।  ऐसी है सिंधुताई "माँ "

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